UPSC Main 2009 : Hindi Literature

1 निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबन्ध लिखिएः (क) विज्ञापनों में नैतिकता (ख) उच्चशिक्षा का निजीकरणः अभिशाप या वरदान (ग) ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी को लागू करने के निहितार्थ (घ) चिकित्सा-पर्यटन और भारत के लिए उसका महत्त्च (ङ) नक्सलवाद के राजनीतिक-सामाजिक समाधान

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2नीचे दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और फिर गद्यांश के बाद दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए। उत्तर सुस्पष्ट, सही और संक्षिप्त होने चाहिए - लार्ड ली की अध्यक्षता के अधीन भारत में वरिष्ठ सिविल सेवाओं पर रायल आयोग ने, जिसने अपनी रिपोर्ट 1924 में पेश की थी, लेाक सेवा आयोग की स्थापना की सिफारिश की। इसके परिणामस्वरूप सर रोस बार्व$र की अध्यक्षता में अक्तूबर 1ए 1926 को पहले लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई। लोक सेवा आयोग को प्रदान किए गए सीमित परामर्शी प्रकार्य और इस पर हमारे स्वतंत्राता आंदोलन के नेताओं के द्वारा निरंतर बल दिए जाने के फलस्वरूप, भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अधीन एक परिसंघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई। स्वतंत्राता के पश्चात् परिसंघीय लोक सेवा आयोग संघ लोक सेवा आयोग बन गया और उसको जनवरी 26ए 1950 को भारत के संविधान के प्रख्यापन के साथ एक संवैधानिक स्थिति प्रदान की गई। संघ लोक सेवा आयोग को भारत के संविधान के अनुच्छेद 315 के अधीन स्थापित किया गया है, और उसमें एक अध्यक्ष और दस सदस्य होते हैं। संघ लोक सेवा आयोग को प्रकार्यात्मक आदेश संविधान के अनुच्छेद 320 और 321 के अधीन दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 323 के अधीन, संघ लोक सेवा आयोग का राष्ट्रपति को एक वार्षिक रिपोर्ट देनी आवश्यक होती है। उसके बाद वह रिपोर्ट और साथ ही एक ऐसा ज्ञापन जिसमें उन मामलों का विस्तार से उल्लेख होता है जिनमें आयोग की सलाह को स्वीकार नहीं किया गया हो, संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाता है। (क) वह कौन सा आधार था जिसके फलस्वरूप पहले लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई थी? (ख) किन कारणों से परिसंघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई थी? (ग) परिसंघीय लोक सेवा आयोग का नाम कब और किस तरीके से बदला गया था? (घ) जहाँ तक संघ लोक सेवा आयोग को अनुप्रयोज्यता का सम्बन्ध हैं, एक और संविधान के अनुच्छेद 320 और 321 और दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद 323 के बीच विभेदन कीजिए। (छ) इस गद्यांशा में शब्द ‘ज्ञापन’ का क्या तात्पर्य है?

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3निम्नलिखित लेखांश का लगभग 200 शब्दों में सारलेख तैयार कीजिए। शीर्षक सुझाना आवश्यक नहीं है। शब्द-सीमा के अपालन के परिणामस्वरूप उपयुक्त अंक काटे जा सकते हैं। अपने सारलेख को केवल अलग से दिए गए पन्ने पर ही लिखिए, जिसको उत्तर पुस्तिका के अंदर मजबूती से नत्थी कर देना आवश्यक होगा। ध्यानपूर्णता के द्वारा, सिद्धार्थ का मन, शरीर और श्वास पूरी तरह से एक थे। ध्यानपूर्वक के उनके अभ्यास ने उनकी एकाग्रता की महान शक्तियों के निर्माण के योग्य बना दिया था, जिनको वे अब अपने मन और शरीर पर चेतना आलोकित करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे। ध्यान में गरहे प्रवेश कर जाने के पश्चात् वे अपने स्वयं के शरीर में, नितांत विद्यमान क्षण मे, असंख्य अन्य जीवों की उपस्थिति को देखने लगे थे। कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ, खनिज, मांस, घास, कीट, जंतु और मनुष्य सभी उनके भीतर विद्यमान थे। उन्होंने अपने सभी पूर्व जीवनों, सभी जन्मों और मृत्युओं को देखा। उन्होंने हजारों विश्वों और हजारों तारों के सृजन और विनाश को देखा। उन्होंने प्रत्येक जीव µ माताओं से जन्में, अंडों से जन्मे, विखंडन के द्वारा जन्मे, और विभाजन के द्वारा नए, जीवों में परिवर्तित µ सभी के सुख-दुख का अनुभव किया।उन्होंने देखा कि उनके शरीर को प्रत्येक कोशिका में सारा स्वर्ग और पृथ्वी विद्यमान है और तीनों कालोंµभूतकाल, वर्तमान और भविष्य - का विस्तार है। यह रात्रि की प्रथम दृष्टि का समय था। गौतम ध्यान चिंतन में और भी गहरे प्रवेश करते चले गए। उन्होंने देखा कि असंख्य विश्वों का किस प्रकार उत्थान और पतन हुआ, किस प्रकार उनका सृजन और विनाश हुआ। उन्होंने देखा कि असंख्य जीव किस प्रकार असंख्य जन्मों और मृत्युओं में से गुजरते हैं। उन्होंने देखा कि ये जन्म-मरण बहारी दिखावों के अलावा वु$छ भी नहीं हैं, सत्य यथार्थ नहीं है। ये उसी प्रकार है कि समुद्र को सतह पर लाखों लहरें निरंतर उठती और गिरती रहती हैं, जबकि समुद्र तो जन्म और मरण से परे रहता है। यदि तरंगें समझ जायें कि स्वयं जल हैं, तो वे जन्म और मृत्यु से उ$पर उठ जाएंगी और वे समस्त भय को काबू कर लेने के बाद वास्तविक आंतरिक शांति को प्राप्त कर लेंगी। इस अनुभूति ने गातम को जन्म और मरण के जल से उ$पर उठने के योग्य बना दिया और वे मुस्करा दिए। उनकी मुस्कान गहर रात्रि में खिलने वाले ऐसे पुष्प की भांति थी, जो प्रकाश के प्रभामंडल का विकिरण कर रहा हो। यह मुस्कान एक आश्चर्यजनक बोध की मुस्कान थी, सभी दूषणों के विनाश के बोध की। उन्होंने बोध के इस स्तर को द्वितीय प्रेक्षण के द्वारा प्राप्त किया था। नितांत उसी क्षण मेघगर्जना हुई और आसमान के आरपार तड़ित के विशाल वज्र चमके, मानो स्वर्ग को दो भागों में विपाटित कर दिया हो। काले बादलों ने चांद और तारों को छुपा दिया। झमाझम वर्षा होने लगी। गौतम पूरी तरह भीग एग थे। परन्तु वे टस से मस नहीं हुए। उन्होंने अपने चिंतन - मनन को जारी रखा। विचलित हुए बिना, उन्होंने चेतना से अपने मन को आलोकित कर दिया। उन्होंने देखा कि जीव दुख भोगते हैं, क्योंकि वे इस बात को नहीं समझते कि सभी जीवों का एक साझा आधार है। अज्ञानता अनेक दुखों, भ्रांतियों और मुसीबतों को जन्म देती है। लालच क्रोध, घमंड, संदेह, ईर्ष्या और भय सभी की जड़ें अज्ञानता में हैं। जब हम वस्तुओं की वास्तविक प्रकृति को गहराई से देखने के लिए अपने मनों को शांत करना सीख लेते हैं, तब हमें ऐसा पूर्ण बोध प्राप्त हो सकता है, जो प्रत्येक दुख और दुश्चिंता को विनष्ट कर देता है और स्वीकार्यता एवं प्रेम का उदय करता है। गौतम ने अब पाया कि बोध और प्रेम एक ही है। ज्ञानोदय के बिना प्रेम नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव उसकी शारीरिक, भावानात्मक और सामाजिक दशाओं का परिणाम होता है। जब हम इस बात को समझ लेते हैं, तब हम क्रूरतापूर्वक व्यवहार करने वाले व्यक्ति से भी घृणा नहीं कर सकते परन्तु हम उसकी शरीरिक, भावानात्मक और सामाजिक दशाओं को रूपांतरित करने में मदद करने की कोशिश कर सकते हैं। समझ से करूणा एंव प्रेम का उदय होता है, जो उसके बाद सही क्रिया को जन्म देते हैं। प्रेम करने के लिए, सर्वप्रथम समझना जरूरी है। अतएव समझ ही मुक्ति की वु$ंजी है। सुस्पष्ट समझ प्राप्त करने के लिए, यह आवश्यक है कि हम ध्यानपूर्वक जीवन-यापन करें, वर्तमान क्षण में जीवन के साथ सीधा संपर्व$ बनाएं और अपने अंदर और बाहर जो घटित हो रहा है उसको हम वास्तविक रूप में देखें। ध्यान पूर्णता का अभ्यास करने से गहराई से देखने की योग्यता प्रबल होती है, और जब कभी हम किसी वस्तु की तह तक की गहराई से देखते हैं, तो वह स्वयं अपने को उद्घाटित कर देती है। यही ध्यानपूर्णता का गुप्त कोष है µ इसी के द्वारा मुक्ति एवं ज्ञानोदय की प्राप्ति का रास्ता खुल जाता है।

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4निम्नलिखित अंग्रेजी गद्यांश का अनुवाद हिन्दी में कीजिएः As our experience reveals, progress is a rapid wherever there is an efficient administrative set-up, a high level of education and minimum political interference in development activity. To me, development is a security-centric phenomenon – from poverty to food security, social security and thereafter national security. In India 2020, we have indentified five areas, where India has a core competence for integrated action. First among these five is agriculture and food processing, where we have a set a target of 360 million tonnes of food and agricultural production. Agriculture and agro food processing, particularly by way of value addition, would bring prosperity to the rural people and speed up economic growth. The second area is power. A reliable supply of electricity in all parts of the country is a must. The third area is education and healthcare. Here we have found that education and healthcare are interrelated. For example, Kerala with high literacy and better healthcare could bring down the rate of population growth and improvement in the quality of life in the state. Similarly, in Tamil Nadu too we have seen a fall in the birth rate that is linked to these factors. Studies in Andhra Pradesh indicate a similar trend.

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5निम्नलिखित हिन्दी गद्यांश का अंग्रेजी में अनुवाद कीजिएः प्रारंभ से ही धार्मिक महाकाव्य भारत पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ने के लिए प्रयत्नशीलन रहे हैं। इन महाकाव्यों में जो आख्यान सम्मिलित किये गये हैं, राष्ट्रीयनायक, जिन्हें वे उल्लासपूर्वक अपनाते हैं और वे सत्य जिनकी कल्पनाशील अभिव्यक्ति इनमें की जाती है कवि, नाटककार, राजनीतिक, चिन्तक, मूर्ति-शिल्पी इनसे अपने प्रमुख विषय और अमोघ प्रेरणा प्राप्त करते हें। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वे उच्चवर्ग से लेकर साधारण जनों तक में राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। शिक्षितों के सामने निरक्षर लोग भी महाकाव्य के इन आख्यानों से परिचित रहते हैं। यहाँ तक कि ब्रिटिश शासन में भी जब साक्षरता अपने निम्नतम स्तर पर थी, साँझ ढले काम खत्म होने के बाद पुरुष, स्त्रिायाँ और बच्चे गाँव में किसी एक स्थान पर एकत्रित होकर प्रशिक्षित कथा वाचकों से महाकाव्यों के इन आख्यानों का पाठ बड़ी रुचि से सुनते थे। इस प्रकार वे आस्था-भाव से आवश्यक नैतिक शिक्षा एवं आत्मिक सत्य की एक शश्वत परम्परा से जुड़े थे। इसका भारतीय जनता के विशाल समुदाय पर एक सकारात्मक प्रभाव (जो शायद ही अतिरंजित हो) वास्तविक रूप से पड़ा। यह सत्य है कि कोई भी यह कह सकता है कि भारतीय किसान और मजदूर में एक गहरी चेतना अब भी मौजूद है कि भले ही वे सब तरह से अज्ञानी हों किन्तु धार्मिक क्षेत्रा की महत्त्वपूर्ण सूचनाओं से वे अवगत हैं।

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